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शाम की छोटी रोशनी
दरवाज़े के पास छोटा दीया.
कभी एक छोटी रोशनी पूरे कमरे को नहीं, बस घर लौटने की दिशा को उजाला देती है.
रोशनी की एक जगह
पुराने घरों की याद में हमेशा बड़ा आँगन या चमकीला कमरा नहीं होता. कभी दरवाज़े के पास रखी छोटी रोशनी याद रह जाती है. शाम उतरते ही वह चौखट का किनारा दिखाती है; भीतर रखा सामान अपनी जगह पर है, यह महसूस कराने के लिए इतना काफ़ी है. यह किसी एक घर की कहानी नहीं, उस परिचित आदत पर एक विचार है जिसमें दिन की भागदौड़ से पहले घर को थोड़ा शांत किया जाता है.
धीमा होना भी एक काम है
छोटी लौ को देखते हुए नज़र ठहरती है. उसी तरह कोई पुराना गीत भी हमें कुछ मिनट धीमे सुनने का मौका देता है. गाना समाप्त होने से पहले अगला गाना चुनने की जल्दी न हो तो उसकी धुन के आसपास की आवाज़ें भी सुनाई देती हैं: कप रखने की हल्की आवाज़, खिड़की से आती हवा, किसी कमरे में चलती बातचीत. इस ठहराव को याद रखने के लिए पुरानी तस्वीर होना ज़रूरी नहीं.
आज की सुनने की रस्म
“Dheere Jalna” सुनिए. अगर शाम को सुरक्षित हो, कमरे की तेज़ रोशनी थोड़ी कम कर दीजिए या खिड़की के पास बैठिए. मोमबत्ती या दीया जलाना आवश्यक नहीं. गीत के बाद एक पल रुककर देखिए कि घर में कौन-सी छोटी रोशनी आपको सबसे परिचित लगती है. यादें कभी-कभी बस इतनी-सी जगह से लौटती हैं.