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वक्त की एक छोटी निशानी
पुराने कैलेंडर का आख़िरी पन्ना.
तारीख़ें बदलती हैं, पर उनके साथ जुड़ी छोटी बातें हमेशा एक साथ नहीं जातीं.
दीवार से उतरता महीना
दीवार पर टँगा कैलेंडर कभी घर का सबसे सीधा हिसाब रखता था. दूध का बिल, किसी परीक्षा की तारीख़, मिलने आने वाले रिश्तेदार का नाम—ज़रूरी बातें खाली खाने में पेंसिल से लिख दी जाती थीं. महीना खत्म होने पर पन्ना पलट जाता, पर पीछे बनी हल्की रेखाएँ वहीं रह जातीं. शायद इसीलिए पुराना कैलेंडर केवल बीते दिनों की गिनती नहीं लगता; वह उन छोटे कामों की जगह भी लगता है जिनसे रोज़मर्रा बनती है.
जो लिखा नहीं गया
हर याद के पास तारीख़ नहीं होती. बरामदे में थोड़ी देर बैठना, किसी से रास्ते में मिल लेना या चाय ठंडी होने से पहले बातचीत पूरी कर लेना—इनमें से बहुत कुछ कैलेंडर पर दर्ज नहीं होता. फिर भी किसी पुराने पन्ने को देखकर मन उसी मौसम तक पहुँच सकता है. यह दावा नहीं कि हर घर में ऐसा हुआ; बस इतना कि काग़ज़ की एक साधारण चीज़ कभी समय को छूने का बहाना बन जाती है.
आज की सुनने की रस्म
आज “Jane Kahan Gaye Woh Din” सुनने से पहले अपने घर के किसी पुराने महीने को याद कीजिए. उस महीने से जुड़ी एक छोटी बात काग़ज़ पर लिखिए, चाहे उसका दिन याद न हो. फिर गीत सुनिए और उस नोट को किसी किताब में रख दीजिए. याद को पूरी तरह वापस लाना ज़रूरी नहीं; उसे थोड़ी जगह देना ही काफ़ी है.